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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, April 3, 2019

क्रांति का नाम शब्द बारूद जैसा चलायें,-दीपकबापूवाणी

क्रांति का नाम शब्द बारूद जैसा चलायें, रौशनी बुझाकर अंधेरों को ही जलायें।
‘दीपकबापू’ चेतना की दलाली में बीते बरसों, चिंत्तन का कीड़ा रक्त में नहलायें।।
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टूटे खिलौने कभी जोड़ते नहीं है, दिल के जज़्बात कभी तोड़ते नहीं है।
घाव पर लगे हमदर्दों का मेला, ‘दीपकबापू’ दर्द से ध्यान मोड़ते नहीं है।।
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अभिव्यक्ति कुचलने का गम है,
गालियां देते शब्दों में बम है।
कहें दीपकबापू पाखंडी बने देव
झूठी हमदर्दी में उनकी आंखे नम हैं।
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साथी वह मिलें
हमारी पसंद की जो बात कहें।
कहें दीपकबापू वरना अकेलेपन की
उदासी आनंद से सहें।

Thursday, March 28, 2019

पर्यावरण में विष घोलकर विकास की बात करते हैं-दीपकबापूवाणी (Vish Gholkar vikas ki baat karte hain-DeepakbapuWani)

नेता अभिनेता प्रचार के लिये बोलें,
हर रस मे अपने शब्द घोलें।
ंभाषा के अलंकार भूलते
अर्थ के नाम पर अनर्थ खोलें।
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राम नाम पर सत्ता का सुख लूट,
भ्रष्टाचार की भी लेते छूट।
‘दीपकबापू’ बनाई कायरों की फौज
फायदों के लिये पड़ती जिसमें फूट।।
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कभी गरीबी से हमने साथ निभाया
पसीने ने पैसे से भी साथ पाया।
‘दीपकबापू’ जिंदगी के होते अनेक दौर
अपना हाथ ही जगन्नाथ पाया।
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जोगिया वस्त्र न पहने हैं,
धैर्य मौन जैसे गहने हैं।
‘दीपकबापू’ गुण अगर साधु हों
उनके चरण मुक्त धारा में बहने हैं।
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पर्यावरण में विष घोलकर
विकास की बात करते हैं।
कहें दीपकबापू नाकाम लोग
सम्मान अपने सिर पर धरते हैं।
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खूबसूरत सुबह खबरों से दूर
दिल बेचिंता सामने मनमोहक नूर।
कहें दीपकबापू जैसे रिमोट पकड़ा
दुनियां के संकट लगे सामने घूर।
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यहां बदनामी भी बिक जाती
बदले में नाम मिल जाता है।
कहें दीपकबापू काले दागों का भी
सुंदर चित्र वाला दाम मिल जाता है।
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सूट लाख बूट हजारों का पहने,
जनसेवकों के ठाटबाट का क्या कहने।
कहें दीपकबापू भलाई के दलाल
पालने के दर्द लोगों को हैं सहने।
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अब किनारे बैठकर 
सड़क पर गुजरते कारवा
गुजरते हुए देखने का
मजा लेने दो यारों
कभी हम भी ऐसे ही
भीड में शामिल होते थे
यादों की बहती धारा का
बहते देखें का
मजा लेने दो यारों
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Monday, July 16, 2018

राजकोष लूटकर उपहार करते प्रदान-दीपकबापूवाणी (rajkosh lootkar dete upahar-DeepakBapuWani)

इंद्रदेव की करें स्तुति तो बरसात हो, डूबते सूरज को भी नमन करें तब शुभरात हो।
‘दीपकबापू’ व्यर्थ लिखी चांद पर शायरी, पानी ऊर्जा देने की जिससे न कभी बात हो।।
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वक्ता की छवि जिनकी शब्द उनके अर्थहीन, भीड़ लगाते पर अकेले में होते दीन।
‘दीपकबापू’ सीना फुलाकर हमेशा गरजते रहे, सजाकर नक्कारखाना बजाते बीन।।
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राजकोष लूटकर उपहार करते प्रदान, कमाये बिना किये जा रहे भीड़ में दान।
‘दीपकबापू’ शास्त्र जाने बिना बनते राजसेवक, डंडधारी साथ लेकर बचाते जाने।।
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कामना न जाने साधु संत सन्यासी, न पूरी हो तब भी पकड़े हो जाये चाहे बासी।
‘दीपकबापू’ त्यागी का रूप धरे घूम रहे, सिर पर चढ़ी माया बताते उसे दासी।।
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अपने दर्द में सब फंसे किसे बेदर्द कहें, बीमारी संग दवा का निभाना कब तक सहें।
‘दीपकबापू’ जिंदा समाज का भ्रम पालते, जिसकी सांसे महंगे इलाज में बहती रहें।।
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दागदार सभी किस पर कैसे भरोसा करें, सत्य के सभी शत्रू किसे क्यों कोसा करें।
‘दीपकबापू’ मिलावटी पदार्थ खायें हर समय, लोग कैसे अंदर शुद्धता पालापोसा करें।।
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गंदगी के ढेर छिपाकर विकास का रूप बतायें, रेत पर खड़ी हरियाली जलायें।
‘दीपकबापू’ बरसों से देख रहे स्वयंभू देवता, न रौशनी करें न जलधारा लायें।।
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Wednesday, June 27, 2018

कठपुतली के खेल पर चलता अब जनतंत्र-(kathputali ke khel par chalata ab Jantantra-DeepakBapuWani0

रोटी की तलाश करें धूप में उनका बसेरा, महलवासी कहें मुफ्त में जमीन को घेरा।
‘दीपकबापू’ परायी करतूतों पर नज़र डालते, अपने काले कारनामें से सभी ने मुंह फेरा।।
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कत्ल हुई लाशों पर जमकर रोते हैं, फिर कातिलों के हक का बोझ भी ढोते हैं।
‘कहें दीपकबापू’ हमदर्दी के सौदे में कमाते, वही बीमारी के साथ दवा भी बोते हैं।।
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वादे लुटाते दिल खोलकर पूरे कौन करे, खाली मटके में पानी शब्द बोलकर कौन भरे।
‘दीपकबापू’ मजबूर बंधक राजपद संभालें, विज्ञापन में वंदना बजे अक्लमंद मौन धरे।।
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ज़माने पर राज का अहंकार कौन छोड़ पाया, गैर दर्द पर हंसना कौन छोड़ पाया।
‘दीपकबापू’ सभी जीवों से ज्यादा अक्ल पाई, फिर भी अहंकार कौन छोड़ पाया।।
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कठपुतली के खेल पर चलता अब जनतंत्र, मांस के बुत पढ़ रहे अभिव्यक्ति मंत्र।
‘दीपकबापू’ धन बल से जीत लेते जनमत, पांच बरस भोगते चलाते राज्य यंत्र।।
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चिराग जलाते और मोर पंख हिलाते, सर्वशक्तिमान को अपनी शक्ति से हिलाते।
सड़क पर थामें भिन्न भिन्न रंग के झंडे, ‘दीपकबापू’ बाहर लड़ें अंदर हाथ मिलाते।।

Tuesday, June 19, 2018

शराबियों का भी बहुत नाम होता है-दीपकबापूवाणी (sharabiyon ka Bhi bahut nam nai-DeepakBapuwani)

अच्छी सोच के लिये अच्छा देखना है जरूरी, चलों जहां श्रृंगार से सजी सभा पूरी।
‘दीपकबापू’ बोतल का जिन्न बना न साथी, मयखानों में इलाज की आस रही अधूरी।।
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दिल चाहे औकात से ज्यादा पाने की, दिमाग सोचे ताकत से ज्यादा जाने की।
‘दीपकबापू’ भटक रहे अपनी ख्वाहिशें, खरीददारी जेब में रखे ज्यादा आने की।।
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शराबियों का भी बहुत नाम होता है, उनकी आसक्ति में भक्ति का काम होता है।
‘दीपकबापू’ हर कतरे पर नाम लिखा, शराब से मिला जल ग्लास में जाम होता है।।
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बिछड़े इंसान याद में रहें कई बरस, गुजरे पल फिर मिलने की सोच में रहे तरस।
‘दीपकबापू’ गुरुओं की शरण ने भुलाया नाम, अच्छा हो राम जपें दिल हो सरस।।
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जंग के लिये अपना सीना फुलायें हैं, कब होगी तारीख सबके सामने भुलाये हैं।
दीपकबापू शस्त्र विक्रताअें से निभाते दोस्ती, जनमानस को देशभक्ति में सुलायें हैं।।
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मुंह से दहाड़ कर बन रहे हैं शेर, कर्म के नाम पर लगा रहे शून्य के ढेर।
‘दीपकबापू’ पेड़ के नीचे करें शयनासन, पेट भरे तभी जब हवायें गिरातीं बेर।।
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Friday, June 1, 2018

मन में धन बसा मुख मे सजी भक्ति-दीपकबापूवाणी (Man mein Dhan bas mukh mein saji Bhakti-DeepakBapuWani)

जल का बोझ लादे बादल वर्षा लाते, गर्मी से तपते पेड़ बिना शुल्क आनद पाते।
‘दीपकबापू’ जनसेवा में बनाने लगे महल, बांट रहे कल्याण भारी शुल्क बनाते।।
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जिंदगी में चाहतें कभी पूरी नहीं होती, लालच में जलते पर आसं पूरी नहीं होती।
‘दीपकबापू’ हर सामान पर नज़रें लगाते, जरुरतें कभी खास पूरी नहीं होती।।
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मन में धन बसा मुख मे सजी भक्ति, दयावान बनने के लिये मांग रहे शक्ति।
‘दीपकबापू’ अध्यात्मिक यात्रा में बितायें बरसों, छोड़ न पाये विषयो में आसक्ति।।
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भरोसा किस पर करें शक के दायरे में सब, कौन वफा के नाम करे गद्दारी कब।
‘दीपकबापू’ दोस्तों की फेहरिस्त बड़ी है, पर अभी तक निभा रहा अपना ही रब।।
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थाली में जो मिला खुशी से खालो यार, मिलती नहीं घी में डूबी रोटी हर बार।
‘दीपकबापू’ सुख स्वाद में जिंदगी गुजारते, जुबान से करें सब पर शब्द से वार।।
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सेवक नाम बताकर राजा जैसे चलते, धंधे जैसे राज चलायें साथ परिवार पलते।
‘दीपकबापू’ बचपन में सिंहासन मिले, सदाबहार जवान रहें बुढ़ापे में नहीं ढलते।।
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विकास का मंत्र महंगाई बढ़ना बताते, सबका भला करने के बहाने सबको सताते।
‘दीपकबापू’ बड़ा लंगर चलाने का दावा, खाली सजी थालियां पक्का प्रमाण जताते।।
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तस्वीर में आना हर चेहरे की है चाहत, हर कोई अनाम रहने से है आहत।
‘दीपकबापू‘ अंदर कर लेते अपनी तलाश, उन्हें जिंदगी में अमन की है राहत।।
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Wednesday, May 23, 2018

हुकुम अब नाकाबिलों के हाथ है-दीपकबापूवाणी (Hukum naklabion ke haath hai-DeepakBapuWani)


पद पैसे का बल सबकी गर्दन तनी है,
गोया दुनियां उनके साथ ही बनी है।
कहें दीपकबापू बंदे बहुत कम मिले
जिनकी वाणी ज्ञान में घनी है।
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न घर न दिल की गदगी हटायें,
स्वर्ग की चिंता में उम्र घटायें।
कहें दीपकबापू भक्ति का पाखंड
सोच यह कि धन के सौदे पटायें।
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रास्ते में कहीं धूप कहीं छांव,
साथी उदासी शहर हो या गांव।
कहें दीपकबापू क्यों बेजार दिल
जब चल रहे अपने ही दम पांव।
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हुकुम अब नाकाबिलों के हाथ है,
रहम अब बेदर्दों के साथ है।
कहें दीपकबापू करुण रस सूखा
उम्मीद भी पत्थर दिलों के हाथ है।
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भूख का दौर बार बार क्यों आता है,
रोटी का चेहरा इतना क्यों भाता है।
कहें दीपकबापू देने वाले राम
इंसान को चिंतायें क्यों गाता है।
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